NDMC CHARKHA MUSEUM


Ganga Ben Kutir

चरखे के पुनर्उत्थान की कहानी


गंगा बेन

१९१७ में गाँधी जी गुजरात शैक्षणिक संस्था के अध्यक्ष चुने गए | उसका अधिवेशन नर्मदा तट पर भरुच में हुआ था | वह भी चरखे की खोज चालू थी |  गाँधी जी का परिचय गंगबहान मजूमदार नामक बड़ी कर्मठ शूरवीर महिला से हुआ | वे एकाकी थी | पति स्वर्गस्थ थे | बाल - बच्चे नहीं थे | उन्होंने अपनी खुद की समझ से अस्पृश्यता को अपने जीवन से निकाल दिया था |  बिरादरी-बंधन को बेधड़क तोड़कर अपने तरीके से समाज-उत्थान में लगी हुई थीं | गाँधी जी ने चरखे के बारे में अपना दर्द गंगा बहन को बताया |  गंगा बहन ने वह भगीरथ काम अपने जिम्मे ले लिया | सर्दी, बरसात और चिलचिलाती धुप में किसी साथ या सहारे के बिना वह गाँव-गाँव घूमती रहीं | लोगों के कबाड़खाने को, टूटी-फूटी टपरियों और जर्जरित अटारी को छानती फिरीं |  अंत में महाराजा गायकवाड़ के बड़ौदा  बबीजपुर गाँव के नन्हे  छज्जे में एक टूटा-पता धूल-धूसरित चरखा मिल गया | बड़ी मिन्नत करके गंगा बहन ने मुसलमान गृहपति से उस चरखे को दुरुस्त करवाकर चलाना सीख लिया | बाबा आदम के जमाने के उस चरखे को लेकर वे साबरमती आश्रम पहुंची | सारा आश्रम इस अद्भुत खोज से उछाल पड़ा | गाँधी जी का उत्साह और आनंद असीम था | अब हिन्दुस्तान के अर्द्ध भूखे-नंगे किसान को रोजी-रोटी का सहायक साधन उपलब्ध हो जाएगा, ऐसी आशा जाग उठी | परदानशीन पिछड़ी गरीब औरते भी अपने चूल्हे -चक्खी और बच्चों के बीच समय निकालकर घर बैठे चरखा चलाकर स्वतंत्र आमदनी कर पाएंगी और तब यह दारुण दरिद्रता भी दूर हो जाएगी , ऐसा लगने लगा |

चरखा तो आया लेकिन रूई की पूनी नहीं मिलती थी | बीजापुर गाँव वालों ने गंगा बहन को आश्वासन दिया था की वे अपने टूटे-फूटे चरखे ठीक करेंगे और कातेंगे भी , लेकिन उनके पास पूनियां नहीं थीं | गाँधी जी ने उमर सुभानी से इसका उल्लेख किया | उन्होंने अपनी मिल से कपास की बनी पूनियां गाँधी जी को भेज दीं | लेकिन यह भी समस्या का समाधान नहीं था | उमर सुभानी उदारमना थे | जितना माँगते उतनी पूनिया भेजते | लेकिन उस भलेमानुष का उपकार लेते जाना उचित नहीं लगता था | दुसरे ये पूनियां भी मशीन की बानी थीं | आखिरकार पुरातन काल में तो मिल की पूनियां नहीं मिलती थीं;  था की वे लोग पूनी कैसे बनाते थे? गंगा बहन ने पूनी बनाने वाले को खोज निकालने  का काम ले लिया |  उन्होंने एक धुनकर को ढूँढ निकाला | वह महीने के पचास रूपये वेतन चाहता था | उन दिनों पचास रूपए आज के लगभग पचास हज़ार रूपए थे | लेकिन गांधी जी कितना ही दाम देकर भी काटने और पूनी बनाने की कला हस्तगत करना चाहते थे | तब कपास की शोध आरम्भ हुई | यशवंत प्रसाद देसाई नाम के एक व्यक्ति कपास ले आए| दो विद्यार्थियों को उस धुनकर के हाथ तले प्रशिक्षण देने के लिए तैयार किया गया | इस प्रकार रूई धुनना और पूनी बनाना आरम्भ हुआ | जब यह सब बीजापुर में चल रहा था तब साबरमती आश्रम में मगनलाल गाँधी चरखे पर प्रयोग कर रहे थे और उस पर हाथ से कते सूत से खादी बुनना भी आरम्भ हुआ | पहली खाड़ी की कीमत सत्रह आने गज पड़ी | उतने में तो मिल की पूरी धोती मिलती थी, लेकिन गाँधी जी को यह जी को यह सारा खर्च मंजूर था | अनेक मित्रो ने उस मोटे महंगे कपड़े को ख़ुशी-ख़ुशी खरीद लिया |

इस सारे समय गाँधी जी पेचिश की बिमारी के बाद बम्बई में रेवाशंकर झवेरी के मणिभवन में अशक्त  पड़े थे, लेकिन उनका दिल तो  चरखे में ही लगा था | मणिभवन के नीचे सड़क पर गद्दे, रजाई, तकिये धुनने की पुकार करता रोज़ धुनकर(धुंआ, कढ़ेरा) गुजऱता था | गाँधी  जी ने सोचा, जो आदमी गद्दे की रूई धुन सकता है वह कातने की कपास भी तैयार  कर देगा | उसे ऊपर की मंजिल पर बुलाया गया | वह आया तो सही, लईकिन ऊँचे दाम मांग रहा था| उसे मोती रकम देकर ललचाया तब उसने पूनी बनाकर देने का आश्वासन दिया | बम्बई में भी काटने वाले की खोज तो जारी ही थी | कहीं झुग्गी-झोंपड़ी से दो कातने वाले आए | उन्होंने तीस ग्राम सूत की कटाई का एक रूपया मांगा | वह देना पड़ा | वे दोनों मणिभुवन में काटने लगे | लेकिन बीजापुर की तुलना में वे बहुत ज्यादा दाम ले रहे थे | यह चोरी थी और वे अपना दाम काम करने पर राजी नहीं थे तो उनको छोड़ना पड़ा, लेकिन इतने दिनों में अवन्तिकाबाई और शंकरलाल बेंकर की वृद्ध माँ और बसुमती बहन ने चरखा चलाना सीख लिया था |  उस चरखे की  गाँधी जी मानसिक संतोष मिलने लगा उनका स्वास्थ्य ठीक होने लगा | इन्ही दिनों में हरिजन रामजीभाई  और उनकी पत्नी गंगा आश्रम में आकर बसे | उन दोनों ने आश्रमवासियों को बुनना सीखा दिया |

आरम्भ में जो खाड़ी बनी उसकी चौड़ाई २६ इंच थी | ऐसे मोटे कपडे को हमारी दादी ने हाथ से  आड़ा जोड़ा और जब अपने लिए ५२ इंच की साडी बनाकर पहनना आरम्भ कर दिया | भगवान् जाने कैसे उस टाटनुमा कपडे को दादी अपनी नाजुक कमर पर बांधती थीं या उस पल्ले को संभाल पाती थीं | यह तो अच्छा था की वह सदैव सुन्दर सुडौल थीं तो मोटा बोरा भी उन पर सुघड़ दीखता था | हम लोग तो ऐसे मोटे कपडे पहनकर कहीं बाहर निकलने लायक दिखेंगे ही नहीं |

स्त्रियों ने तो अपनी कुशलता से खादी अपना ली | लेकिन पुरुषों के लिए २६ इंच पने की धोती पहनना कठिन था | गाँधी जी इस आभाव से अधीर हो उठे | उन्हें तो शुद्ध खादीधारी बनने की तमन्ना थी | उन्होंने बेचारी गंगा बहन को नोटिस दी की एक महीने में  लायक ५० इंच पाने की खादी तैयार की जाए | अन्यथा गाँधी जी २६ इंच पने का लंगोटा ही पहनने लगेंगे | यधपि ५० इंच करघा पाना कठिन काम था, लेकिन गंगा बहन मजूमदार पुरुषों की ऐसी मांग से घबराने वाली नहीं थीं | वे बड़ी कारगर महिला थीं | शायद कहीं से ५० इंची करघा खोज लाई या बढ़ई से बनवा भी लिया हो | लेकिन एक महीना समाप्त होने से पूर्व गाँधी जी को ५० इंची खादी की धोती मिल गई थी | १९२० तक चरखे और करघे में अनेक संशोधन हुए | उनके कलपुर्जे आश्रम के सरंजाम कार्यालय में बनने लगे | प्रत्येक आश्रमवासी और आश्रमप्रेमी चरखा चलाना सीख गया | यहाँ तक की कांग्रेस अधिवेसन में भी गाँधी जी अपना चरखा साथ ले जाते थे |  बहस सुनते जाते और चरखा चलाते रहते थे | गाँधी जी ने नियम बना लिया था की सूत काते बिना भोजन करेंगे | धीरे -धीरे कड़ी का प्रचार बढ़ा | पहले नेताओ ने खाड़ी स्वीकार  सारे देश में चरखे चलने लगे | तब गाँधी जी ने अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना की | कश्मीर से कन्याकुमारी, मणिपुर-असम से लेकर काठियावाड़ और उत्तर-पश्चिम में सरहदी प्रांत तक खादी उत्पादन और वितरण केंद्र लगभग पुरे देश में छा गए | खादी पहनना एक फैशन बन गया  और आजादी की लड़ाई में सशक्त संबल बन गया | सफ़ेद खादी के कपड़े और सफ़ेद टॉप सज्जनों की पोशाक बन गई | गाँधी जी ने बहुत विचार कर सफ़ेद टोपी का  प्रचार किया था | सफ़ेद रंग जल्दी गन्दा दिखेगा तो साफ़ करने के लिए झटपट धोना होगा | इससे सफाई की आदत बनेगी और मेल छिपाने की जो कुरीति होती थी उससे बचा जाएगा | गंदगी छिपाना भी एक प्रकार का असत्य है, आलस्य की निशानी है | सफ़ेद टोपी अनायास उस असत्य  बचा लेगी | यह सफ़ेद टोपी गाँधी टोपी कहलाई और देशप्रेमियों की यूनिफार्म बन गई | खादी  में विनोबा जी का बहुत बड़ा योगदान रहा | वे सबसे अच्छा और ज्यादा सूत स्वयं कातते थे | उन्होंने नन्ही तकली को ही मिनी पोर्टेबल चरखा बना लिया | उस पर विनोबा जी अपनी आवश्यकता का पूरा कपड़ा तैयार कर लेते थे |

Source: Mere Pitamah by Sumitra Gandhi Kulkarni - https://books.google.co.in/books?id=sQi4qLYefvoC&printsec=frontcover&output=html_text

 

As a tribute to Ganga Ben for her contribution, GANGA BEN KUTIR has been established in premises of Charkha Museum.


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